Thin-Film Solar Cells: 2025 के अंत तक सोलर टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक ऐसा ब्रेकथ्रू सामने आया है, जो आने वाले समय में बिजली बनाने के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है। वैज्ञानिकों ने सिर्फ 7 नैनोमीटर जितनी पतली परत का इस्तेमाल कर ऐसा सोलर सेल विकसित किया है, जो कम धूप में भी करीब 30 प्रतिशत ज्यादा बिजली पैदा कर सकता है। यह परत इतनी पतली है कि इंसानी बाल की मोटाई के लगभग 10,000वें हिस्से के बराबर मानी जाती है। इस खोज को सोलर एनर्जी की सबसे बड़ी चुनौती, यानी कम रोशनी में कम आउटपुट, का मजबूत समाधान माना जा रहा है।

क्या है यह नई 7 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी
दुनियाभर में सोलर एनर्जी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि यह साफ, सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का बड़ा जरिया बन चुकी है। हालांकि, पारंपरिक सिलिकॉन सोलर सेल भारी, महंगे और कम रोशनी में कम असरदार साबित होते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक अब थिन-फिल्म सोलर सेल पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जो हल्के, सस्ते और आसानी से बनाए जा सकते हैं।
दक्षिण कोरिया के चोननाम नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेयॉन्ग हियो और डॉक्टर राहुल कुमार यादव की टीम ने इसी दिशा में एक अहम काम किया है। उन्होंने टिन मोनोसल्फाइड (SnS) आधारित सोलर सेल में एक नई इंटरफेस इंजीनियरिंग तकनीक अपनाई, जिससे सेल की परफॉर्मेंस में बड़ा सुधार देखने को मिला।
कैसे बढ़ी सोलर सेल की एफिशिएंसी
इस नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने सोलर सेल की एब्जॉर्बर लेयर और मोलिब्डेनम बैक कॉन्टैक्ट के बीच जर्मेनियम ऑक्साइड (GeOx) की सिर्फ 7 नैनोमीटर मोटी परत जोड़ी। यह परत कई अहम काम एक साथ करती है। यह सोडियम के अनचाहे डिफ्यूजन को रोकती है, ऊंचे तापमान पर नुकसानदायक मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड बनने से बचाती है और इंटरफेस पर होने वाले इलेक्ट्रिकल लॉस को कम करती है।
नतीजतन, चार्ज का कलेक्शन और ट्रांसपोर्ट बेहतर होता है। जहां पहले इस सोलर सेल की पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी 3.71 प्रतिशत थी, वहीं अब यह बढ़कर 4.81 प्रतिशत हो गई है, यानी करीब 30 प्रतिशत की रिलेटिव बढ़ोतरी।
भविष्य में सोलर और दूसरी तकनीकों पर असर
इस खोज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कम धूप, बादल वाले मौसम, शाम के समय या इंडोर लाइटिंग में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। जहां पारंपरिक सोलर सेल ऐसी परिस्थितियों में अपनी क्षमता का सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं, वहीं यह नई तकनीक उन्हें कहीं ज्यादा असरदार बना सकती है। इतना ही नहीं, यह इंटरफेस इंजीनियरिंग तरीका सिर्फ सोलर सेल तक सीमित नहीं रहेगा।
इससे थिन-फिल्म ट्रांजिस्टर, थर्मोइलेक्ट्रिक डिवाइस, सेंसर, फोटोडिटेक्टर और मेमोरी डिवाइस जैसी उन्नत तकनीकों में भी सुधार की उम्मीद है। सितंबर 2025 में जर्नल Small में प्रकाशित यह अध्ययन स्केलेबल माना जा रहा है, यानी इसे इंडस्ट्री लेवल पर आसानी से अपनाया जा सकता है।
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